What is Meteoroids (उल्‍कापिंड क्‍या है)

Physics Space & Time

What is Meteoroids (उल्‍कापिंड क्‍या हैं)।

रात्रि के समय जब आकाश साफ हो तथा चन्‍द्रमा भी न दिखाई दे रहा हो तो आप कभी-कभी आकाश में प्रकाश की एक चमकीली धारी-सी देख सकते हैं। इसे शूटिंग स्‍टार-सा टूटता तारा (meteoroid) कहते हैं। इन्‍हें उल्‍का कहते हैं। उल्‍का सामान्‍यत: छोटे पिंड होते हैं जो यदा-कदा पृथ्‍वी के वायुमण्‍डल में प्रवेश कर जाते हैं। इस समय इनकी गति उच्‍च चाल होती है।
वायुमण्‍डलीय घर्षण के कारण ये तप्‍त होकर जल उठते हैं और चमक के साथ शीघ्र ही वाष्पित हो जाते हैं। यही कारण है कि प्रकाश की चमकीली धारी अति अल्‍प समय के लिए ही दृष्टिगोचर होती है।
What is meteoroids
कुछ आकार में इतनी बड़ी होती हैं कि पूर्णत: वाष्पित होने से पूर्व ही वे पृथ्‍वी पर पहुँच जाती हैं। वह पिंड जो पृथ्‍वी पर पहुँचता है उसे उल्‍का पिंड कहते हैं।


What is meteoroids
आकाश में कभी-कभी एक ओर से दूसरी ओर अत्यंत वेग से जाते हुए अथवा पृथ्वी पर गिरते हुए जो पिंड दिखाई देते हैं उन्हें उल्का और साधारण बोलचाल में ‘टूटते हुए तारे’ अथवा ‘लूका’ कहते हैं।
उल्काओं का जो अंश वायुमंडल में जलने से बचकर पृथ्वी तक पहुँचता है उसे उल्कापिंड (Meteoroid) कहते हैं। उल्‍का पिंड वैज्ञानिकों को उस पदार्थ की प्रकृत‍ि की खोज करने में सहायता करते हैं जिससे सौर परिवार बना है।

उल्‍कावृष्टि (Meteor Shower) What is Meteoroids

जब पृथ्‍वी किसी धूमकेतु(Comet) की पूँछ को पार करती है तो उल्‍काओं के झुँड दिखाई देते हैं। इन्‍हें उल्‍कावृष्टि कहते हैं। कुछ उल्‍कावृष्टि नियमित समय अंतराल पर हर वर्ष होती है। आप किसी वैज्ञानिक पत्रिका या इन्‍टरनेट से उनके दिखाई देने के समय का पता लगा सकते हैं।
हाल ही में यह खबर आई है कि कोई एस्‍टेरायड अप्रैल 2020 में पृथ्‍वी से टकरायेगा। इसकी सच्‍चाई जानने के लिए इस लिंक पर क्लिक करें- आखिर क्‍या है सच्‍चाई 29 अप्रैल की

भ्रांतियां (Misconceptions)

हम जब छोटे थे या अब भी बहुत से लोग ऐसा सोचते हैं कि टूटता हुआ तारा (उल्‍का पिंड) दिखे तो उससे कुछ न कुछ अवश्‍य मांग लेना चाहिये। अर्थात उसे देखते हुए मन में ही अपनी विश मांग लेनी चाहिए और यह पूरी करेगा। अब इस भ्रांति से बाहर आ गये है सब। अत: इन भ्रांतियों पर विश्‍वास न करें।

उल्‍का पिंड और क्षुद्रग्रह (Asteroid) में भिन्‍नता होती है।

भारतीय संग्रह (Indian Collections)

उल्कापिंडों का एक बृहत् संग्रह कलकत्ते के भारतीय संग्रहालय (अजायबघर) के भूवैज्ञानिक विभाग
में प्रदर्शित है। इसकी देखरेख भारतीय भूवैज्ञानिक सर्वेक्षण संस्था के निरीक्षण में होती है। प्रचलित
नियमों के अनुसार देश में कहीं भी गिरा हुआ उल्कापिंड सरकारी संपत्ति होता है। जिस किसी को
ऐसा पिंड मिले उसका कर्तव्य है कि वह उसे स्थानीय जिलाधीश के पास पहुँचा दे जहाँ से वह
भारतीय भूवैज्ञानिक सर्वेक्षण विभाग को भेज दिया जाता है। इस प्रकार धीरे-धीरे यह संग्रह अपने
ढंग का अनोखा हो गया है। इसके अतिरिक्त इस संग्रह में विदेशों से भी प्राप्त नमूने रखे गए हैं।


एशिया भर में यह संग्रह सबसे बड़ा है और विश्व के अन्य संग्रहों में भी इसका स्थान अत्यंत ऊँचा है,
क्योंकि एक तो इसमें अनेक भाँति के नमूने हैं और दूसरे अनेक नमूने अति दुर्लभ जातियों के हैं।
सब मिलाकर इसमें 468 विभिन्न उल्कापात निरूपित हैं, जिनमें से 149 धात्विक और 319 आश्मिक वर्ग के हैं।

इस संग्रहालय की सबसे बड़ी भारतीय आश्मिक उल्का इलाहाबाद जिले के मेडुआ स्थान से प्राप्त
हुई थी । वह 30 अगस्त 1920 को प्रात: 11 बजकर 15 मिनट पर गिरी था। उसका भार प्राय:
56,657 ग्राम (4,818तोले) है और दीर्घतम लंबाई 12 इंच है। दूसरा स्थान उस पिंड का है जो
मलाबार में कुट्टीपुरम ग्राम में 6 अप्रैल 1914 को प्रात: काल 7 बजे गिरा था। इसका भार 38,437
ग्राम (3,295 तोले) है। इस संग्रह में रखे हुए उल्कापिंडों का विवरण भारतीय भूवैज्ञानिक सर्वेक्षण के
मेमॉयर संख्या 75 में विस्तारपूर्वक दिया हुआ है। (विकिपिडिया के अनुसार)